सत्संग का प्रभाव
सत्संग का प्रभाव
May 31, 2022 by
Naman Gurumukh Ji
सत्संग का प्रभाव महान् है
जो भी संत-महापुरुषों के वचन सुनता है, मनन करता है और उनपर अमल करता है उसका जीवन सफल हो जाता है। वह आत्मिक उन्नति की ओर निरन्तर बढ़ता है। महापुरुषों के वचन जीव के मन पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं, जिनके प्रभाव से जीव का आत्म कल्याण होता है।
मन को निरन्तर सत्संग के प्रकाश की ज़रूरत है
मन विषय-रस-भोगों से विमोहित होकर बार-बार भक्ति पथ से भटकता है। इसे निरन्तर सत्संग के प्रकाश की ज़रूरत है जो इसे हर क्षण सही दिशा दर्शाता है तब सब बन्धनों को तोड़ जीव चरम लक्ष्य की प्राप्ति करता है। सन्तों के पावन वचन जीवन में नई रोशनी भर देती हैं।
भक्ति पथ पर साधक सुदृढ़ होकर लक्ष्य की ओर बढ़ता है। सत्संग की प्राप्ति केवल-केवल विरली तथा अत्यधिक संस्कारी अधिकारी रूहे ही होती है।सत्संगति अमूल्य है।
सत्संगति की प्राप्ति भाग्यो की निशानी है
सत्संगति की प्राप्ति भाग्यो की निशानी है। इतिहास में अनगिनत उदाहरण है जो सत्संगति का प्रभाव दर्शाते हैं। वेदों-शास्त्रों ने सत्संग का महिमा ‘नेति-नेति’ कह गाई है। निम्नलिखित कथा सत्संग की महिमा को दर्शाते है।
विश्वामित्र जी और वशिष्ठ जी
विश्वामित्र तपस्वी थे और वशिष्ठ जी सत्संगी थे। इन दोनों में विचारों का मतभेद था। विश्वामित्र तप की सराहना करते थे कि इसके द्वारा मानुष्य का जीवन सफल है परन्तु वशिष्ठ जी सत्संग की महिमा गाया करते थे कि इससे बढ़कर संसार में अनमोल वसतु नहीं है। एकबार इन दोनों ऋषियों में इस बात पर
वाद-विवाद हो गया। दोनों प्रमाण दे-देकर अपने-अपने पक्ष को ऊँचा और श्रेष्ठ बताने लगे।
दोनों बलवान थे और शास्त्रों को जाननेवाले थे
दोनों अपनी-अपनी जगह पर बलवान थे और शास्त्रों को जाननेवाले थे। जब शास्त्रार्थ करते हुए बहुत समय हो गया और कोई उचित फल न निकला तो अन्त में दोनों के बीच यह बात ठहरी कि किसी तीसरे मनुष्य को न्यायकारी बनाया जाये और जो फैसला वह करे उसको ठीक समझा जाये।
यह विचार कर दोनों वहाँ से चल पड़े और ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी बोले मुझे इस मामले में न लाओ और न मैं आपका फैसला करना उचित समझता हूँ क्योंकि मैं जो कुछ कहूंगा वह एक के प्रतिकूल होगा और सम्भव है।
दोनों का शिव जी के पास जाना
तुमको मेरी बात पर विश्वास न आये इसलिए उचित यह है कि तुम शिवजी के पास जाओ और जो आज्ञा वे दें उस पर अमल करो। फिर दोनों ऋषि कैलाश पर्वत पर पहुँचे।
शिवजी पर्वत की चोटी पर मृगछाला बिछाये हुये बिराजमान थे । दोनों की बातों को सुनकर हँसे और कहने लगे कि मेरे यहाँ न्याय नहीं हुआ करता क्योंकि ज्ञान समदशी हुआ करता है। तुम लोग विष्णु के पास जाओ, वे मर्यादा पुरुषोत्तम है, वे तुम्हें हर बात का निश्चत उत्त उत्तर देंगे।
फिर दोनों ऋषि महादेव जी से विदा होकर बेकुंठ में गये।
दोनों का विष्णु जी के पास जाना हुआ
विष्णु भगवान ने उनका यथायोग्य स्वागत किया और सत्कार सहित दोनों को बिठाया तथा शान्ति के साथ पूछा, आप लोगों का कैसे आना हुआ?
दोनों ने हाथ जौडकर प्रार्थना की प्रभु - भगवनसत्संग, और तप की महिमा पर बहुत झगड़ा हो गया है, अब आप न्याय करें इन दोनों में सर्व श्रेष्ठ है?
विष्णु भगवान् बोले - कि मैं तुम्हारा झगड़ा मिटा तो दूं , परन्तु मेरे विचार में उचित यह है कि तुम दोनों शेषनाग जी के पास जाओ। वे भलीभाँति इस झगड़े को समाप्त कर देंगे ।
पाताल लोक मे जाना
विष्णु भगवान् जी की आज्ञा पाकर दोनों वहाँ से विदा हुए और पाताल में पहुँचे। शेष जी अपने सहस्र मुखों से भगवान् के नाम की स्तुति गा रहे थे। इन्होंने जाते ही प्रणाम किया और बैठ गये।
शेषनाग जी इनको देखकर बोले-आओ ऋषियो! कैसे दर्शन दिये?
दोनों ने अपनी कथा सुनाई। शेष जी बोले - मैं तुम्हारा झगड़ा समाप्त कर दूंगा, परन्तु तुम देखते हो कि मेरे सिर पर सम्पूर्ण धरती का बोझ है। यदि तुम में से एक थोड़े समय के लिए धरती को थाम रखे तो मुझे सोचने का अवसर मिल जायेगा। विश्वामित्र का स्वभाव बड़ा उग्र था। तुरन्त उठे और अपने तप का बल देकर धरती को कन्धों पर उठाने लगे।
परन्तु ज्योंहि धरती का बोझ कन्धों पर पडा, एकदम घबरा उठे। महाराज यह बोझ मुझसे नहीं सहें जाता ।
शेषनाग बोले - वशिष्ठ जी तुम उठाओ। वशिष्ठ जी ने कहा ऐ धरती! यदि मैंने यथार्थ रूप में सत्संग किया है, तो एक पल भर का फल तुझे देता हूँ। तू ठहर जा। वशिष्ठ जी- का यह कहना था कि धरती अडोल हो गई। शेषनाग बोले, देखो विश्वामित्र! अब फैसला आपने आप हो गया।
अब बोलो क्या चाहते हो ? शेषनाग जी ने विश्वामित्र जी से कहा
यह सुनकर उन्होंने शेषनाग के चरणों में नतमस्तक झुकाया और वहाँ से विदा होकर अपने-अपने आश्रमों की ओर चल दिए।
॥ दोहा ॥
तप के वर्ष हज़ार हों , सत्संगत घड़ी एक ।
तो भी नहीं बराबरी, शुकदेव किया विवेक ॥
इसप्रकार योग-यज्ञ-जप-तप और ज्ञानादि कोई भी सत्संग की बराबरी नहीं कर सकते। सत्संग की महिमा इन सबसे ऊपर है। जो लोग सन्तों के सत्संग में जाते हैं, उनके मार्ग में ये सीढियाँ आप ही आप तय हो जाती हैं और जो साधन शास्त्रों में कहे गये हैं, सत्संग में आ जाने से स्वयं ही प्राप्त हो जाते हैं, इनके लिए कछ विशेष साधन करने का आवश्यकता नहीं रहती हैं।
बोल जय कारा बोल मेरे श्री गुरुमहाराज की जय
Jai Sachidanand Ji
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" भोजन है जीवन निर्वाह के लिए
और जीवन है प्रभु की याद के लिए ।"
" वे खुश किस्मत होते है जो हर समय अपना ध्यान प्रभु में केंद्रित रखते है "
मन वैरी था , वह भी मेरा मीत बन गया।
जबसे सतगुरु से खजाना आत्मज्ञान का मिला।
आइना साफ़ मेरे कामिल - ऐ - मुर्शिद ने किया।
उनकी रहमत से ही दिलबर का दर्शन हुआ।
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