आत्मज्ञान कैसे होता है ?
आत्मज्ञान कैसे होता है ?
May 31, 2022 Tuesday
महापुरुषों के वचन हैं किनिद्रा भोजन भोग भय, ये पशु पुरुष समान । नरन ज्ञान निज अधिकता, ज्ञान बिना पशु जान ॥
आत्मज्ञान – अर्थात् नींद करना, भोजन खाना, परिवार की वृद्धि करना, शत्रु के भय से स्वयं को बचाना-ये सब समझ तो पशु और पुरुष में समान है। इन्सान की बढ़ाई यह है कि उसको वह बुद्धि प्राप्त है जिससे वह सत्पुरुषों द्वारा ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
आसा की वार में लिखा है कि
कुंभे बधा जलु रहै जल बिनु कुंभु न होइ ॥ गिआन का बधा मनु रहै गुर बिनु गिआनु न होइ ॥
फ़रमाते हैं कि जैसे घड़े के बिना जल नहीं टिका रह सकता परन्तु जल के बिना घड़ा नहीं बन सकता। वैसे ही मन ज्ञान के बन्धन से टिका रहता है परन्तु गुरु के बिना आत्मिक ज्ञान की उपलब्धि नहीं हो सकती।
आत्मज्ञान किस से प्राप्त होता है ?
जैसे दुनिया में प्रत्येक वस्तु अपनी अपनी जगह से मिलती है, वैसे आत्मज्ञान भी वक्त के सन्त सद्गुरु से प्राप्त होता है। जब दुनिया की तुच्छ चीजें भी बिना मूल्य के नहीं मिलती तो ज्ञान रूपी अनमोल रत्न बिना कुछ अर्पण किए कैसे मिलेगा?
फ़रमाया है –
जिस वखर कउ लैनि तू आइआ ॥ राम नाम संतन घरि पाइआ ॥
तजि अभिमानु लेहु मन मोलि ॥ राम नाम हिरदे महि तोलि ॥
फ़रमाते हैं कि जिस सौदे को लेने के लिए मानुष तन धारण करके इस दुनिया रूपी बाज़ार में आये हो, वह नाम रूपी अमोलक दात तुम्हें संतों के द्वार से ही मिलेगी। अगर तुम्हारे मन में लेशमात्र भी अहंकार होगा तो यह सौदा नहीं मिलेगा। मन को अहंकार रहित करके ही इस अमोलक नाम की दात को प्राप्त किया जा सकता है।
आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिए सबसे पहले अपने ज्ञान तो टिकाना पड़ेगा
एक दृष्टान्त है – राजा जनक का
राजा जनक ने एक बार डिंडोरी पिटवाई कि घोड़े पर चढ़ने को जितना समय लगता है उतनी देर में जो मझे ज्ञान दे देगा उसी को में अपना गुरु मानूंगा। हज़ारों विद्वान और पंडित राजदरबार में एकत्रित हए परन्तु कोई भी राजा जनक को संतुष्ट न कर सके।
मुनि अष्टावक्र जी का आना
तभी दरबार में मुनि अष्टावक्र जी का आना हुआ। उन्होंने राजा जनक को कहा कि-राजन्! कोई साधारण : वस्तु भी बिना मूल्य के नहीं मिलती।
आत्मज्ञान – सर्वोत्तम पदार्थ
फिर यह आत्मज्ञान : जो सर्वोत्तम पदार्थ है वह बिना कुछ अर्पण किए कैसे प्राप्त हो सकता है? इसे प्राप्त करने के लिए आप पहले अपने तन मन धन मुझे सौंप देवें फिर मैं आपको अनमोल ज्ञान प्रदान करूंगा।
परमसन्त श्री कबीर साहिब जी ने फ़रमाया है
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान । सीस दिये जो गुरु मिलें, तो भी सस्ता जान ॥
वर्णन करते हैं कि यह मानव तन विष की बेल की तरह है और सद्गुरु अमृत की खान हैं। अगर शीश भेंट करने पर भी सतगुरु की प्राप्ति हो जाती है तो भी इस सौदे को सस्ता जानो।
राजा जनक का तन-मन-धन मुनि अष्टावक्र जी को सौंपने का संकल्प
राजा जनक ने तुरन्त ही विचार करके अपना तन-मन-धन मुनि अष्टावक्र जी को सौंपने का संकल्प ले लिया। तत्पश्चात् राजा ने आदेश देकर जैसे ही घोड़ा मंगवाना चाहा, मुनि अष्टावक्र जी ने तत्काल उन्हें ऐसा करने से रोकते हुए
कहा-“राजन्! आप अपना मन मुझे सौंप चुके हैं, अब दी हुई किसी वस्तु पर आप का कोई अधिकार नहीं। इस मन को मेरे सिवाय आप कहीं भी नहीं लगा सकते।” यह सुनकर राजा जनक ने अपनी समस्त चितवृर्ति को सतगुरु के ध्यान में केन्द्रित कर दिया। मन की चंचलता समाप्त हो गई। मुनि अष्टावक्र जी ने तत्काल उनकी सुरति को अपने चरणों में खींचकर उन्हें शाश्वत आनन्द से सराबोर कर दिया।
सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह । लखा जो चहे अलख को, उन्हीं में लख ले ॥
जिस प्रकार शीशे में अपना प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है उसी प्रकार सतगुरु के ध्यान से अलख पुरुष का दर्शन होता है। सतगुरु की देह दिव्य अमृत से भरी होती है।सतगुरु के दर्शन ध्यान से सुरति स्वतः ही पिण्ड देश से उठकर ब्रह्मांड देश की सैर करने लगती है।
राजा जनक पहले से ही एक उच्च कोटि के संस्कारी और बुद्धिमान पुरुष थे, उन्हें तो केवल पूर्ण सद्गुरु के मिलाप की आवश्यकता थी। गुरु अष्टावक्र जी से रूहानी ज्ञान की दीक्षा प्राप्त करके वे उनके चरणों में नतमस्तक हो गए।
जय हो सतगुरुदेव की
SSDN
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