Sri Leela

                    🙏 jiजय सच्चिदानंद जी 🙏
श्री चतुर्थ पादशाही जी महाराज जी की जीवन लीला ||

बोलो जी कारा बोल मेरे श्री गुरुमहाराज जी  की जय..........

एक बार आप श्री सत्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी की श्री आज्ञानुसार किसी सरकारी कार्य के लिए गुना गए l अभी आपने उस कार्य को पूरा भी नहीं किया था कि इधर श्री आनंदपुर से श्री सतगुरु देव महाराज जी ने आपको आज्ञा भेजी कि रात्रि समय तक श्री आनंदपुर तक अवश्य पहुँच जाएं, यहाँ कोई आवश्यक काम है l जब आपको श्री आज्ञा मिली तो अभी गुना का सरकारी काम जिसके लिए श्री आज्ञा मिली थी वह भी करना अभी शेष था और साथ ही श्री आनंदपुर पहुँचने के लिए श्री आज्ञा आ गई l आप शीघ्रता से सरकारी कार्यालय में गए और काम किया l इधर रेलगाड़ी का समय भी हो चुका था l आप कार्यालय से स्टेशन तक पहुँचने के लिए रेलवे लाइन के साथ छोटे मार्ग की ओर से तेज़-तेज़ कदम रखने लगे l मार्ग में रेलवे की राख जिसमें जलते हुए अंगारे भी थे, लाइन के किनारे पड़ी थी l शीघ्रता के कारण आपको कुछ पता ना चला और आपका एक श्री चरण-कमल राख के ऊपर आ गया l एकदम ही नीचे के अंगारों से आपका सुकोमल चरण-कमल कुछ झुलस गया और पीड़ा होने लगी l परन्तु आपने  इसकी परवाह न की l थैले में से एक कपड़ा निकाल कर पाँव पर बाँध दिया और स्टेशन पर पहुँच कर रेलगाड़ी में बैठ गए और अशोक नगर जा पहुँचे l यहाँ किसी प्रेम ने प्रार्थना की कि आप पहले चिकित्सा करवा लीजिये, कल श्री आनंदपुर चले जाना l आपके लिए तो श्री आज्ञा मुख्य थी l आप  किसी से बिना कुछ कहे श्री आनंदपुर की बस में बैठकर श्री आनंदपुर पहुँच गए l 

         रात्रि को श्री दर्शन खुलने के समय से पहले ही आप हाल में जा कर बैठ गए ताकि श्री सत्गुरुदेव महाराज जी को कुछ पता न चल सके l जब श्री दर्शन खुले तो आपने उस सेवा कार्य का सब वृतांत सुनाया l जब आप वहाँ से लौटने लगे तो किसी प्रेमी ने श्री सत्गुरुदेव महाराज जी के

Ik or Leela
❤️🌹❤️
*एक दिन सहजो बाई जी अपनी कुटिया के द्वार पर बैठी थी, उसकी "गुरुभक्ति" से खुश होकर "परमात्मा" प्रकट हो गये, लेकिन सहजो के अन्दर परमात्मा को देखकर कोई विशेष उत्साह नहीं था*
*परमात्मा ने पूछा, सहजो हम खुद चलकर तुम्हें दर्शन देने आये हैं क्या तुम खुश नहीं हो ?* *सहजो बाई ने हाथ जोड़कर कहा हे प्रभु!! ये तो आपने मुझ ग़रीब पर अति कृपा की है, लेकिन मुझे तो आपके दर्शन की कामना ही नहीं है*         

*परमात्मा ने पूछा कि सहजो तेरे पास ऐसा क्या है, जो तूँ मेरा दीदार भी नहीं करना चाहती ?*

*सहजोबाई ने कहा, हे दीनानाथ, मेरे लिए तो मेरे सतगुरू ही पूर्ण समर्थ हैं और मैंने आपको अपने सतगुरू में ही पा लिया है*
*सहजो का ऐसा प्रेम भाव देखकर, प्रभु बहुत खुश हुए और बोले, सहजो क्या तुम मुझे अदंर आने के लिए नही कहोगी ?*
   *सहजो की आँखें आँसुओं से भरी हुई थी, बोली, हे प्रभु मेरी कुटिया में केवल एक ही आसन है और उस पर मेरे सतगुरू ही विराजते हैं, क्या आप भूमि पर बैठकर मेरा आतिथ्य स्वीकार करेंगें ?*
     *भगवान् ने कहा, तुम हमें जहाँ भी प्रेम से बैठाओगी, हम वहीँ बैठ जायेंगे, और सचमुच में भगवन भूमि पर ही बैठ गए।*
     *परमात्मा ने कहा ! सहजो !! मैं जहाँ भी जाता हूँ कुछ ना कुछ देता ज़रूर हूँ, ऐसा मेरा नियम है । कुछ भी माँग लो। सहजो ने कहा -- प्रभु! मेरे जीवन मे कोई कामना नहीं है। मुझे कुछ भी नहीं चाहिये, प्रभु ने कहा फिर भी कुछ माँग लो सहजो ने कहा हे प्रभु ! आप तो स्वयं एक दान हो, जिसे मेरा दाता सद्गुरू अपने भक्तों को जब चाहे दान में दे देते है*

*आपने तो प्राणी को जन्म मरण, रोग भोग, सुख दुःख में उलझाया हुआ है, ये तो मेरे सदगुरु दीनदयाल ने कृपा करके हमें विधि बताकर, शरण में आये हुए को सहारा देकर, उसे निर्भय बनाकर उस द्वन्द से छुड़ाया है।*
    *प्रभु मुस्कराते हुए कहते हैं, सहजो ! आज मुझे कुछ सेवा दे दे। सहजो ने कहा - प्रभु एक सेवा है, मेरे सद्गुरु आने वाले हैं, जब मैं उन्हें भोजन कराऊँ तो क्या आप उनके पीछे खड़े होकर चँवर डुला सकते हो ?*
 *प्रभु ने सहजो बाई के सतगुरु, सन्त चरणदास पर चँवर डुलाया था। ये है सद्गुरू के प्रति सच्चा समर्पण!*

*काश ! कभी हमारी भी आँख खुल जाए और हम भी अपने प्रीतम का दीदार ऐसे ही करें*

 Dyalu Bhagwan ki Jai
 Jai Sachidanand Ji
          🙏🙏

Comments

Popular posts from this blog

टेक :— मुझें इतना प्यारा गुरु मिला,गुरु का, सोहणां दरबार मिला-२,

टेक :– तुम हमारे थे प्रभु जी, तुम हमारे हो..तुम हमारे ही रहोगे,ओ मेरे प्रीतम -२,

Sri Sarup banaya hai Sri darshan didar 🙏🙏